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गौहत्या अंग्रेज़ों की घिनौनी साज़िश

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Posted by : Loktantrik Media on | May 02,2015

गौहत्या अंग्रेज़ों की घिनौनी साज़िश

 - आमिर खुर्शीद मलिक
आज भारत का दुर्भाग्य है कि विश्व में सबसे बडे मांस निर्यातक देश का दर्ज़ा चाहे-अनचाहे ही हमारे पास है। जो कि सालाना पन्द्रह लाख टन से अधिक है। गौरतलब है कि यूरोप दो हज़ार बरसों से गाय के मांस का प्रमुख उपभोक्ता रहा है। जो पशु कभी मानव के मित्र और सहयोगी हुआ करते थे, उन पशुओं को भी उत्पाद की संज्ञा दी जाने लगी । भारत में अंग्रेजो के बढ़ते वर्चस्व के साथ ही अंग्रेजो के बुरी नज़र भारतीय गाय पर पड गई । भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देने में अंग्रेजों ने अहम भूमिका निभाई।

जब सन् 1700 ई. में अंग्रेज़ भारत में व्यापारी बनकर आए थे, उस वक्त तक यहां गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था। हिन्दू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते, लेकिन अंग्रेज़ इन दोनों ही पशुओं के मांस का सेवन बड़े चाव से करते हैं। भारत मे पहला कत्लखाना 1707 ईस्वी ने रॉबर्ट क्लाएव ने खोला था और उसमे रोज की 32 से 35 हजार गाय काटी जाती थी । 18वीं सदी के आखिर तक बड़े पैमाने पर गौ हत्या होने लगी। यूरोप की ही तर्ज पर अंग्रेजों की बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों ने देशभर में कसाईखाने बनवाए। जैसे-जैसे भारत में अंग्रेजी सेना और अधिकारियों की तादाद बढ़ने लगी |वैसे-वैसे ही गौहत्या में भी बढ़ोतरी होती गई। ख़ास बात यह रही कि गौहत्या और सुअर हत्या की वजह से अंग्रेज़ों को हिन्दू और मुसलमानों में फूट डालने का भी मौका मिल गया। अंग्रेजों के शासनकाल में गाय-बैलों का दुर्दांत क़त्ल आरम्भ हुआ और गोवंश का मांस, चमडा, सींग, हड्डियाँ आदि एक बड़े लाभ वाले व्यवसाय बन कर उभरे ।

ब्रिटिश फ़ौज में गोमांस पूर्ति के के लिए गौमाता को क़त्ल करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम कसाइयों को इस धंधे में लगाया| ताकि हिन्दू-मुसलामानों का आपस में बैर बढे और उनकी फूट डालो शासन करो वाली नीति कामयाब हो । भारतीय गरीब दूध न देने वाली गाय बेचने के लिए विवश था और लोभी इसका लाभ उठाने के लिए तैयार बैठे थे | अगर हम इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटते हैं तो पता चलता है कि भारत में एक लम्बे समय तक शासन करने वाले मुगलों के साम्राज्य में गौहत्या पर पूरी पाबंदी थी | बाबरनामे में दर्ज एक पत्र में बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को नसीहत करते हुए कहा था कि तुम्हें गौहत्या से दूर रहना चाहिए। ऐसा करने से तुम हिन्दोस्तान की जनता में प्रिय रहोगे। इस देश के लोग तुम्हारे आभारी रहेंगे और तुम्हारे साथ उनका रिश्ता भी मजबूत हो जाएगा।

आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र ने भी 28 जुलाई 1857 को बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था। साथ ही यह भी चेतावनी दी थी कि जो भी गौहत्या करने या कराने का दोषी पाया जाएगा उसे मौत की सज़ा दी जाएगी।उस समय के एक उर्दू पत्रकार मोहम्मद बाकर जिनको अंग्रेजों ने बगावती तेवरों के लिए मौत की सजा सुनाई थी, अपने उर्दू अखबार के ज़रिये गौहत्या के खिलाफ अलख जगाने का काम बखूबी करते रहे ।उन्होंने मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच खाई खोदने के लिए गौहत्या को इस्तेमाल करने के अंग्रेजी कारनामो को कई बार उजागर किया । भारत में गौ हत्या को रोकने के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाया जाता रहा है।अलकबीर नाम के स्लाटर हाउस में हर रोज़ हजारों गाय काटी जाती हैं। कुछ साल पहले कुछ संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ मुहिम भी छेड़ी थी, लेकिन जब यह पता चला कि इसका मालिक कोई मुसलमान नहीं, बल्कि गैर मुस्लिम है तो आन्दोलन को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

यह जगज़ाहिर है कि गौहत्या से सबसे बड़ा फ़ायदा गौ तस्करों और गाय के चमड़े का कारोबार करने वाले बड़े कारोबारियों को ही होता है। इन वर्गों के दबाव के कारण ही सरकार गौहत्या पर पाबंदी लगाने से गुरेज़ करती है। वरना दूसरी क्या वजह हो सकती है कि जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता हो, उस देश की सरकार गौहत्या को रोकने में नाकाम है। कुरान में गौहत्या करना आवश्यक विधि नहीं है|हज़रत मुहम्मद साहब ने फरमाया है कि अगर किसी मुसलमान ने किसी मज़हब के इन्सान को नाहक तकलीफ पहुंचाई तो मैं उस गैरमुस्लिम की तरफ से क़यामत के दिन उस खुदा के सामने उस मुसलमान के विरुद्ध खड़ा हूँगा ,इंसाफ दिलाऊंगा| किसी का दिल दुखाना यों भी शरियत में गुनाह है| मुसलमान वही है जो ज़ालिम का साथ कभी ना दे, और अपने आस पास रहने वाले दुसरे धर्म के लोगों का दिल ना दुखाये| हदीस में भी गाय के दूध कोफ़ायदेमंद और गोश्त को नुकसानदेह बताया गया है। गौवध को रोकने के लिए विभिन्न मुस्लिम संगठन भी सामने आए हैं।

दारूल उलूम देवबंद ने एक फ़तवा जारी कर मुसलमानों से गौ हत्या न करने की अपील की है। दारूल उलूम देवबंद के फ़तवा विभाग के अध्यक्ष मुफती हबीबुर्रहमान का कहना है कि भारत में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है। इसलिए मुसलमानों को उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ हत्या से खुद को दूर रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शरीयत किसी देश के क़ानून को तोड़ने का समर्थन नहीं करती।कुछ दिन पहले सहारनपुर के एक मुस्लिम डाक्टर को अपने गौहत्या विरोधी मुहीम के चलते जान गवानी पड़ी |दिल्ली के जंतर मंतर पर गौरक्षा की मुहीम के लिए आमरण अनशन कर रहे मुस्लिम युवक फैज खान का चेहरा अभी भी मेरी आँखों से धूमिल नहीं हुआ है | तस्वीर बिलकुल साफ़ है | गाय का क़त्ल उसके मांस के निर्यातको के साथ-साथ चमड़े,हड्डी आदि के व्यापारियों की काली करतूत का हिस्सा है |एक आम भारतीय मुसलमान गाय के मांस को उसके साथ जुडी श्रद्दा और अपने धर्म में दी गई हिदायतों के मद्देनज़र इस्तेमाल नहीं करता | कुछ शरारती लोग जुर्म करने से बाज़ नहीं आते |पर उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की हिमायत पूरा मुस्लिम समाज करता है |

अब सवाल आता है गाय के चमड़े का कारोबार करने वाले क्या गौ हत्या न कराने का संकल्प लेकर इस पेशे से हो रहे भारी मुनाफ़े को छोड़ने के लिए तैयार हैं ? क्या दूध न देने वाली गायों के लिए हम आर्थिक लाभ के नज़रिए से हटकर गौशालों की व्यवस्था करने को तैयार हैं ? और इन सबसे बड़ा सवाल ……. क्या हमारी सरकार गौरक्षा एवं विकास विषय को अपनी प्राथमिकता सूची में लाकर केन्द्रीय कानून बनाकर गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने को तैयार है ?

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